Woman Looking at Sea While Sitting on Beach

Euthanasia/YMPH-Daily-Writing-Challenge

24/03/2025 की प्रतियोगिता का विषय है “इच्छामृत्यु” हमसे जुड़े हुए प्रतिभावान कवियों के कविताओं को पढ़िए । प्रेम, डर, और अंधकार ऐसे कई मायने होंगे जो कवियों के दिल को भावुक रखते है । ऐसी भावुकता का हम आदर करते है और उनकी भावनाओं को निपुण बनाना ही संकल्प है हमारा । हम हर रोज किसी न किसी विषय पर अपने व्हाट्सएप्प ग्रुप में Daily Challenge प्रतियोगिता के माध्यम से लेखकों तथा कवियों को उनकी बातों को कलम तक आने का मौका देते है । और जो सबसे अच्छा लिखते हैं । आप उनकी लेख इस पेज पर पढ़ रहे है

The theme of the competition for 24/03/2025 is “Euthanasia”. Read the poems of the talented poets associated with us. Love, fear, and darkness are the many meanings that keep the hearts of poets emotional. We respect such sentiments and it is our resolve to make their feelings adept. Every day, we give an opportunity to writers and poets to put their thoughts to pen through the Daily Challenge competition in our WhatsApp group on different Topic. And those who write best. You are reading those article on this page.

Daily Writing Challenge Managed by Dr.Shruti

इच्छामृत्यु/Euthanasia

इच्छामृत्यु – एक सवाल

जीवन का दीपक कब तक जले,
दर्द से तड़पता कब तक चले?
जब साँसें ही बोझ बन जाएं,
तो जीना कैसा, क्यों ये गले?

क्या मृत्यु भी हक हो सकता है,
या बस तक़दीर का लेखा है?
जब पीड़ा का सागर गहरा हो,
तो क्या किनारा एक धोखा है?

कोई बेबस दर्द से लड़ा करे,
या सुकून से खुद को मुक्त करे?
ये सवाल घने बादल जैसे,
क्या सही, क्या गलत कहे?

इच्छा से मृत्यु पाप नहीं,
जब जीवन ही अभिशाप सही।
पर सोचो, गर दर्द बाँट लिया जाए,
तो शायद एक नया सूरज खिले कहीं!

Payal Bansal

“Euthanasia”

My fight or my flight,
Why shoul i fear the world,
When i know what’s right!!

Not all goodbyes,
Make us grieve,
Some whispers mercy,
Some bring relief.

If one holds the hand,
And grants release;
Whole world will see,
Suffering turning into Peace.

No loss, no win,
Its time to accept the ending.
Just a river meeting the sea,
Life disolved into tranquility.

©Vansh Rajniwal

इच्छामृत्यु – वरदान?

इच्छामृत्यु!
सुनने में कितना सुखांत शब्द है ये। मृत्यु का कोई भय नहीं, अपने जीवन की डोर का वास्तव में अपने ही हाथों में होना! पीड़ा असहनीय होने पर सांसों को आप ही थाम देना, तब शायद चिकित्सकों को यूथेनेशिया करने की जरूरत न पड़ती।
किसी की सांसों पर कैसे किसी और अधिकार हो सकता है?
स्वतंत्रता, पूर्ण स्वतंत्रता — नियमों से, कायदों से, कानून से, धर्म से, कर्म से। अद्भुत। ये तो हुई उन सज्जनों की बात जिसे स्वेच्छामरण वरदान समान लगता है।

अब उन इतर जो ठहरे, उनका मत भी देखते हैं। यहां इतर मैं हूं, और शायद आप भी… यह निश्चय पूर्णतः आपका है कि आप किस पक्ष में अपना संतोष पाते हैं।
हां, तो जब जब मैंने ये शब्द सुना है, पलकों के सामने एक ही शख्शियत की तस्वीर उभरी है। किसकी? उसकी जिसने अपने पिता के सुख के लिए, आजीवन ब्रह्मचर्य स्वीकारा था। जो राजा, राजनीति, धर्म और जीवन के विभिन्न पहलुओं का महाविद्वान था। जो सदैव धर्म को सर्वोपरि रख कर बढ़ा। जो राजधर्म की गरिमा रखने के लिए, कुल की गरिमा को तार तार होते देखता रहा। प्रेम से पितामह, और आदर से भीष्म कहलाने वाले। गंगा पुत्र देवव्रत।
इच्छामृत्यु का वर पाया था, फिर भी हर दूसरे क्षण मृत्यु का अनुभव करते रहे — तन से नहीं, मगर मन से अवश्य। जिस सिंहासन का त्याग किया, आजीवन जिस राज्य की सेवा का संकल्प लिया, उसी को शनै: शनै: ज़ार–ज़ार होते देखना पड़ा। अपनी एक एक स्वांस को अपने राजधर्म और राज्य को समर्पित कर दिया ज्ञात था कि वे ढाल हैं हस्तिनापुर की, ज्ञात यह भी था कि राजधर्म के लिए धर्म को लज्जित कर बैठे हैं, ज्ञात यह भी था कि जिस राज्य को एक शिशु की भांति उन्होंने अपने आलिंगन में समेटे रखा था, उसका विनाश अवरोध्य था। ज्ञात सब था। फिर भी होनी रोक न सके।
इच्छामृत्यु का वर था। उसे भी संकल्प में पिरो दिया। स्वतंत्र होना चाहिए था न, मगर आजीवन बंधे रहे, संकल्पों में, राजधर्म में, बंधनों में।
क्या कह दूं कि इच्छामृत्यु यहां एक वर था? बाणों की शैय्या पर अंतिम स्वांस ली थी उन्होंने। घनघोर पीड़ा से घिरकर। जिस राज्य के लिए आजीवन जिए, उसी का विध्वंश होते देखना ही, उनकी अंतिम स्मृति बनी।

जब इच्छामृत्यु भीष्म जैसे पराक्रमी के लिए वरदान नहीं बन सकी, तो उन सज्जनों को यह भ्रम क्यों, मुझे ज्ञात नहीं। कर्म लौटकर स्वयं के पास ही आता है। पितामह का भी आया। तुम, साधारण प्राणी, कब तक अछूते रह सकोगे?

कर्मणां फलं अत्रैव लभ्यते।

© शिवांगी पाण्डेय
@ineffable_sentiments_7

 

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