डरता हूं खुदसा होने में
सो डर है मुझको रोने में
डोने भर पाई है खुशियां
पाया है छेद भी डोने में
टकराना पड़ता लहरों से
इक नाव को नौका होने में
गर काट रहे विष इसमें क्या
क्यूं ध्यान रखा ना बोने में
हर तरफ से चुभ ही जाता है
मुझसी ही कमी है तिकोने में
पुरुषत्व को कम करना पड़ता
नर को नारिश्वर होने में
सबने मुझको खिसकाया पर
कोना कितना हो कोने में
